लेखनी कहानी -22-Dec-2022
रात को मावस की अपनी
आंख का अंजन बनाकर
रक्तवर्णी एक दिनकर
भाल पर अपने सजाकर
फूल सतरंगी थे जिसमे
वह नवल उद्यान पहने।
मन के बसंती नेह से निर्मित
नए परिधान पहने।
चल पड़ी थी तुम हवा में
खुशबुओं को घोलती सी,
बाग में बहके बसंती
मौसमों से बोलती सी।
दृष्टि की पावन छुअन से
फूल बागों के खिलाकर
जिस घड़ी तुम आन बैठी
थी हमारे पास आकर।
जगमगाहट में तुम्हारी
रूप रति का खो रहा था,
और तुम्हारी छवि निरख कर
काम कुंठित हो रहा था।
-अभिलाषा देशपांडे
Sachin dev
22-Dec-2022 06:14 PM
Well done
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SNEH KI DlARY
22-Dec-2022 05:22 PM
लाजवाब
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fiza Tanvi
22-Dec-2022 01:53 PM
Good
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