पनघट सा

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पनघट--दो शब्द               राजीव रावत कौन समझ पाया जीवन को सच! कैसी इसकी माया है- जीवन तो एक पनघट सा है बस जीव  प्यास बुझाने आया है- मकड़ जाल सा जीवन ...

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