प्रेम छंद

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सोलह सृंगार करे रति ठाड़ी, लाज को भान रहे न रहे,, मौन कि भाषा को समझो रे, अधरन से है कहे न कहे,, भाव के पुश्प चढ़े मनमंदिर, प्रेम से पावक ...

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