बन्द झरोखे में

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नारी की व्यथा। बंद झरोखें के पार। आँसु कहाँ कुछ कह पाते हैं। बस चुपचाप गोलों पर लुढक आते है। समझा देते मन की व्यथा को। तड़प कर जो रह जाते ...

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