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प्राण का प्रण सुदृढ़ सुव्यवस्थित, सुसंगठित क्रम सा । अंतराल की छाया नहीं, न था भ्रम सा।। मन उत्साहित तन लालायित, हो चिंतनीय प्राण। एकाग्रता समरूप ...