स्त्री और जीवन

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ऑखली में मूसल से पिटता है जैसे घुन.. वैसे ही  स्त्री के जीवन की पिसती जाती है धुन.. जितना बनती है वो जिम्मेदारी का दाना .. उतनी ही कूटी जाती है ...

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