प्रेमाश्रम--मुंशी प्रेमचंद

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... मित्रगण कुछ देर तक और बैठे रहे, लेकिन प्रेमशंकर कुछ ऐसे दब गये कि फिर जबान ही न खुली। अन्त में सब एक-एक करके चले गये। सूर्यास्त हो रहा था। ...

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