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वैशाली जी कि नज़रे बार बार दरवाज़े कि और टिकी थी उनकी एक नज़र दरवाज़े पर थी तो दूसरी दीवार पर टंगी घड़ी पर जिसमे लगी सुइंया ना जाने किस रफ़्तार ...