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जूम कर रहा डीपी तेरी

जूम कर रहा डीपी तेरी 
ऑख लगाती रहती फेरी ।
भले मुबाइल मेरी लगती
चित्र भरा रहता है तेरी ।।

जाने क्या एहसास हो रहा
जाने कोई  पास आ रहा ।
जुल्फ बिखेरे अभी है आयी
ऐसा क्यों विश्वास हो रहा ।।

बिखरे केश होठ तक आते
लगता जैसे अमृत पाते ।
जैसे कोई फूल खिला हो
भौरे चुम्बन झुण्ड में पाते ।।

गोरे रंग से ज्यादा गोरी
लगती स्वर्गिक धरा की थोरी ।
देख-देख मन रोमांचित है
बार-बार गाता है लोरी ।।
डॉ दीनानाथ मिश्र

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कमाल के अहसास

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