प्रेम
प्रेम
मेरा मन मेरे बस में है
हाँ मै उसको चाहूँगा ।
न आये यह उसकी मर्जी
मै भी नही बुलाऊंगा ।।
प्रेम सत्य है प्रेम भरोसा
प्रेम ब्रह्म लगता साकार ।
मै करता हूँ मै सुख पाता
जाये वह हो जहाँ विचार ।।
उसकी अनगिन साँसे चलती
हमको कभी नही है खलती ।
मेरी एक आह निकले तो
यह मेरी खुद- गर्जी लगती।।
सपने देख रहा हूँ उसका
उसका मन है मत आये ।
मै भी तो हू मस्त फकीरा
इधर-उधर अब न जाये ।।
नही मानता प्रेम देह है
नही मानता काम नेह है ।
नही मानता स्वारथ सब कुछ
नही मानता वह विदेह है ।।
धारण धर्म प्रेम ही बल है
नैतिकता का उत्सव तल है ।
प्रेम विना जीना क्या जीना
यही त्याग है यही सुफल है ।।
डॉ दीनानाथ मिश्र
ऋषभ दिव्येन्द्र
02-Apr-2023 01:22 PM
बहुत खूब 👌👌
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Rajeev kumar jha
02-Apr-2023 11:40 AM
शानदार
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Alka jain
02-Apr-2023 10:59 AM
Nice 👌
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