Gopal Gupta

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ग़ज़ल

समा यूँ ही तँन्हा जली है मुसाफ़िर।
अँधेरे की  साजिश टली है मुसाफ़िर


चला दौर नफ़रत का चारो तरफ है।
ये कैसी हवा अब चली है मुसाफ़िर।।

मिटाया ख़ुदी को तो पाया ख़ुदा को।
नदी आज सागर     हुई है मुसाफ़िर।।

देखा यतिमो को सब भर सिसकते।
लगा जैसे रूठी ख़ुशी है मुसाफ़िर ।।

जहाँ भर की दौलत है क़दमो में मेरे।
मगर खल रही इक कमी है मुसाफ़िर।।

शहर में महोबत का मेंला लगा है ।
यूँ आँखों में ठहरी नमी है मुसाफ़िर।।

जहाँ भर की खुशियाँ है दामन में लेकिन।
हुई गुम लबो की हँसी है मुसाफ़िर।।

नहीं मुस्कुराहट किसी के लबो पर।
कायनात सारी दुखी है मुसाफ़िर। ।

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3 Comments

Milind salve

11-Apr-2023 07:48 AM

बेहतरीन

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Varsha_Upadhyay

10-Apr-2023 11:30 PM

बहुत खूब

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Gunjan Kamal

10-Apr-2023 09:15 PM

बहुत खूब

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