ग़ज़ल

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समा यूँ ही तँन्हा जली है मुसाफ़िर। अँधेरे की  साजिश टली है मुसाफ़िर चला दौर नफ़रत का चारो तरफ है। ये कैसी हवा अब चली है मुसाफ़िर।। मिटाया ख़ुदी को तो ...

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