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रेखा




रेखा
हाथ की रेखा है खाली
न दिखे वह रूप वाली ।
किन्तु दिल पर वह खिची है
कोशिशे जाती है खाली ।।

रूप का मनुहार भी करता नही
चेतना पर भार मै बनता नहीँ ।
है नदी के धार सी बहती हुई
सिन्धु न हूँ पर हृदय भरता नही ।।

बिक गया हूँ भोलेपन पर
शान्त निर्मल सहज जल पर ।
होठ निष्फल रह गये पर
पी लिया ऑखो ने जी भर ।।

पत्थरों पर रेख जैसी
है अमित वह लेख जैसी ।
पढता-पढता रह गया पर
अल्पना हूँ देख जैसी ।।

डॉ दीनानाथ मिश्र

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2 Comments

Vishal Ramawat

16-Apr-2023 11:39 PM

nice

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