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तेरा




मै तेरा हूँ दूर करो मत
तू मेरी बन सको भले मत ।
बार-बार मै ही हारा हूँ 
हरा चुकी हो कहो भले मत।।

मै स्वतन्त्र मन का निर्छल हूँ 
विन बन्धन के भी अविचल हूँ ।
मोल मेरा कोई क्या जाने
व्यस्त बहुत हो खाली पल हूँ ।।

अन्तर मन मे वास तुम्हारा
मन की सुन्दर हो तब हारा ।
मथ देती है तेरी बाते
किन्तु कहा दे सकी किनारा ।।


डॉ दीनानाथ मिश्र

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4 Comments

Sachin dev

21-Apr-2023 06:05 PM

Nice

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बहुत खूब

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बहुत ही सुंदर

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