गला रुधा है श्ब्द जुदा है
गला रुधा है श्ब्द जुदा है
सुन-पढकर अखबारों में ।
तीन वर्ष मे इतनी चीखे
दब जाती है नारों में ।।
जाति पंथ में मुद्दा भटका
बिना काम की बाते अटका ।
राजनीति शर्पिणी हुई है
विष से भरी हुई है मटका ।।
मानवता घुटने टेकी है
रावण नही सिया फेकी है ।
कौध रही विजली कानो मे
यही शियाशत की नेकी है ।।
पाखंडी लगती सरकार
दुराचारियों की बाजार ।
तीन वर्ष मे तेरह लाख
महिलाएं लापता निहार ।।
सेवक सेवादार बना है
आज कुहासा और घना है ।
बेटी अगर चीखती है तो
सत्ताओं का हाथ सना है ।।
डा दीनानाथ मिश्र
Abhinav ji
01-Aug-2023 06:33 AM
Very nice 👍
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