मर्यादा
मर्यादा की नदी के पार
हम न मिलेंगे यकीन मानो
उस किनारे जहां तुम खड़े हो
संबोधनों में न उलझना
रीत हम भी जानते हैं जग की
कुछ रिश्ते यूं ही निभा लिए जाए
तो ऐतराज़ क्या है ?
शौहरत कदम चूमती रहे
तालियों के शोर में गुम न होना
बस इतनी सी ख्वाहिश है कि
मिलें तो मुस्कुरा कर
ना भी मिलें तो कुछ गम नहीं
बस थोड़ी सी खुशी
कागज की कश्ती
इस किनारे......
शैलजा ☘️
ऋषभ दिव्येन्द्र
22-Oct-2021 02:38 PM
खूब लिखा आपने 👌👌
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Gunjan Kamal
22-Oct-2021 10:23 AM
Very nice 👌
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Zakirhusain Abbas Chougule
22-Oct-2021 10:12 AM
Nice
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