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लेखनी कहानी -21-May-2024

जो मुझे भाता नहीं है उसको मैं सोचूं ही क्यों? जो मेरा अपना नहीं है, उसको मैं सोचूं ही क्यों?

उसको लगती है नसीहत की मेरी बातें बुरी! उसको समझाना नहीं है,उसको मैं सोचूं ही क्यों?

सारी शर्तें मान ली उसकी मगर जाने वह क्यों? जब मेरी माना नहीं है,उसको मैं सोचूं ही क्यों?

"सगीर" थी जिसकी तमन्ना मैंने उसको पा लिया और कुछ पाना नहीं है,उसको फिर सोचू मैं क्यों?

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2 Comments

hema mohril

23-May-2024 10:58 AM

V nice

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Gunjan Kamal

22-May-2024 08:27 PM

बहुत खूब

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