Rajan tiwari

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आईने

2122-1122-1212-22/112

सच न कहते जो ज़माने से डर गए होते,
टूटकर आईने, कब के बिखर गए होते।

ये तो अच्छा हुआ तूने पलट के देखा नहीं,
वक़्त के पाँव भी वर्ना ठहर गए होते//2

दर्द की चाह ने नासूर कर दिया इनको,
वर्ना ये ज़ख़्म-ए-दिल कब के भर गए होते//3

बैठ साहिल पे लिखी दिल की दास्तां तुमने,
दर्या ए इश्क़ में गहरे उतर गए होते//4

शम'अ की चाह में मरना नसीब है इनका,
शम'अ के बिन भी ये परवाने मर गए होते//5

ये भी अच्छा ही रहा दिल को घर किया तूने,
हम तुझे ढूंढते वर्ना किधर गए होते//6

अपने मैयार को 'राजन' कभी न गिरने दिया,
वर्ना अपनी ही नज़र से उतर गए होते//7

      राजन तिवारी 'राजन'
           इंदौर (म.प्र.)
        7898897777

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