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ग़ज़ल के दिल से जो आह निकली, सुख़न-वरी पे है वाह निकली,, सफ़र मे रस्ता भटक गया हूँ, न मंजिलों को ये राह निकाली,, जहाँ पे उलझा हुआ ज़माना, वही ...