बरसात
बरसात
वो सोखियाँ वो बालपन इन हवाओं का,
रास्ता देखे बहारों में बहती हवाएँ।
उमड़ती घरघराती ये तेज़ हवाओ का काफिला
मौसम को आज फिर से शरारत सूझी है।
सूरज छुप रहा है काले मेघों के आंचल में
उसे लगा है पता कि कोई आने वाला है।
मिल रहे हैं मेघ फिर से कड़कड़ाहट कर
धीरे धीरे उनके आँसुओं की बूंदे बता रही हैं।
धीरे धीरे धरती से मिलन हर एक बूंद का
फिर से उसे नहला रही है।
सड़कें नदी नाले और मेरे घर की देहरी
खुश है आज पानी के इन नर्म थपेड़ों से।
सोच रहा हूँ हर एक लम्हें में चल रही हलचल को
जीवन मे चलती हर कश्मकश को।
क्यों नहीं निकलता खुद भी आसमान के नीचे
बारिश की बूंदों में नर्म हवाओ के साथ।
चाह है वही जो सोचता हूँ
बंधा हूँ एक और भ्रमजाल में।
समय बीत रहा है मैं खड़ा हूँ
“निष्प्राण” देखता सुनता वो मधुर आवाज।
जो बुलाती है दिखाती है सपने हज़ार
न जाने क्यों है सवाल है अनसुलझे।
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Niraj Pandey
07-Aug-2021 01:05 PM
वाह👌
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मनोज कुमार "MJ"
07-Aug-2021 08:59 AM
Bahut Shandar guruji 👌👌👌🙏🙏🙏🙏
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वरुण एकलव्य
06-Aug-2021 09:29 PM
बहुत ही सुंदर भावपूर्ण रचना। किसी भी दृश्य की अलग अलग प्रकार से विस्तृत व्याख्या करनी होती है इसमें आपको प्रवीणता हासिल है। मुझे सच में कई बार सोचना पड़ जाता है कि इस दृश्य की व्याख्या में और क्या लिखूँ दृश्य सरल व सटीक तरीके से कम से कम शब्दों में पा
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Devendra kumar Gamthiyal
06-Aug-2021 09:33 PM
Bahut thank you varun ji
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